"या देवी सर्व भूतेशु, विद्या रूपेण संस्थाम
******* इति ******
"गीत गजल श्रंगार लिखु क्या,
लगता सब बेमानी है,
नमस्तये-नमस्तये-नमस्तये नमो नमः
वंदना
वंदना
वंदना करे- हम अर्चना करे
है माँ सरस्वती तुम्हारी वंदना करे
वंदना करे- हम अर्चना करे -२
(१)
चरणों मै शीश माँ के,
लेखनी हो हाथ में,
सत्य का स़ृजन हो माँ ,
वरदान दो साथ में ,
विद्या की देवी माँ,
धवल वस्त्र धारणी
धवल वस्त्र धारणी
लाये चमन से पुष्प अर्पण केरे
वंदना करे,हम अर्चना करे---------
(२)
स्वर तुम्ही से है माँ,
वाणी तुम्ही से है,
शब्द तुम्ही से है माँ,
हर गीत तुम्ही से है,
कमल पर विराजी माँ,
चार भुजा धारणी
चार भुजा धारणी
लाये श्रद्धा सुमन माँ अर्पण करे
वंदना करे हम अर्चना करे--------
******* इति ******
"गीत गजल श्रंगार लिखु क्या,
लगता सब बेमानी है,
भारत माता व्यथित खड़ी है,
आँख से बहता पानी है"
"पुन: जनम हो अगर कभी तो,
भारत मेरा देश हो,
चाह रही बस इतनी सी,
सैनिक सा परिवेश हो" राष्ट्रीय-चेतना गीत
स्वर्ग से बलिदानियों ने देखा,
भारत माता का ये हाल,
करुण ह्रदय यू पुकार उठे तुम,
जागो भारत माँ के लाल,
जागो भारत माँ के लाल,
(१)
देख दुर्दशा अपने देश की,
स्वर्ग में भी है वो बेचेन
स्वर्ग में भी है वो बेचेन
शहीद हुए जो देश की खातिर ,
क्यों न मिलता उनको चैन
क्यों न मिलता उनको चैन
भारत माता को है खतरा,
जय चंद से गद्दारों का,
जय चंद से गद्दारों का,
फिर न बन जाये कही कोई,
बाग़ वो जलिया वाला सा
बाग़ वो जलिया वाला सा
रक्षक ही भक्षक बन बेठे,
कलंक लगा रहे माँ के भाल
कलंक लगा रहे माँ के भाल
राम राज्य की करी थी कल्पना,
भारत माता क्यों बेहाल,
भारत माता क्यों बेहाल,
भ्रष्ट व्यवस्था भ्रष्ट-तंत्र है,
हर एक और है भ्रष्टाचार,
हर एक और है भ्रष्टाचार,
तुमको ही है कायम करना,
अपने राष्ट्र में शिष्टाचार,
अपने राष्ट्र में शिष्टाचार,
माता बन तुम जीजा बाई,
लालो का आह्वान करो,
लालो का आह्वान करो,
भारत माता को गद्दारों के,
चंगुल से आजाद करो
चंगुल से आजाद करो
वरन स्वतंत्रता को है खतरा,
फिर बंधक बन जाओगे
फिर बंधक बन जाओगे
वीर शिवाजी, भगत सिंह,
आजाद कहा से लओगे,
आजाद कहा से लओगे,
स्वर्ग से बलिदानियों ने देखा.........
** इति!!
** इति!!
तीन रंग का बना तिरंगा,
दूर गगन लहरा देना,
भारत माँ के लालो तुम,
माँ की शान बड़ा देना,
(१)
केसरिया रंग बलिदान का रंग है ,
दुनिया को बतला देना,
माँ की आन को छुए कोई,
चरणों शीश चड़ा देना,
तीन रंग का बना.................
शांति प्रतीक ये श्वेत रंग,
विश्व सन्देश पंहुचा देना,
सर्वे-भवन्तु-सुखिना,
जन-जन को पथ पड़ा देना,
तीन रंग का बना..........................
सुख और सम्रद्धि हेतु,
तीजा रंग बतला देना,
हरी-भरी रहे धरा ये ,
ईश को पुष्प चड़ा देना,
तीन रंग का बना................
सदा प्रगति राह चला जो,
चक्र ध्वजा बतला देना,
अनेकता में रहे एकता,
मन से द्वेष मिटा देना,
तीन रंग का बना.................
तीन रंग का बना.................
* **इति!!
जय- भारत
हम हैं बालक तेरे माता, हम उतारें आरती
जय भारती – जय मां भारती
मां तेरे चरण की रज से हमने,आज ये तिलक लगाया
तेरे ही आशीष से मां, हमने सब कुछ है पाया
सत्य के पथ पर बढ़े चलो, मां तुम्हें पुकारती
जय भारती – जय मां भारती ........
कर्तव्य पथ पर बढ़े सदा, हम तेरा मान बढ़ाऐ
सच्चे अर्थों में मां हम, तेरे ही लाल कहाए
जननी हमको जन्म जों देती, तू तो भाग्य संवारती
जय भारती – जय मां भारती .......
इसकी ज्योत कभी न फीकी, देखो पड़ने पायें,
इसकी आन को छू न पाये, अपने हों या पराये
मां पर आये कोई संकट, हमने ये जां वार दी
जय भारती – जय मां भारती ........
जग के पालन हार ने, जनम यहां पर पाया,
राम-कृष्ण अवतार ने, इसे कर्म भूमि बनाया
पूत-सपूत बनें हम सब, मां हमें निहारती
जय भारती – जय मां भारती .......
"चिंतन मनन जो करे, करे वतन के वास्ते
लेखनी जब भी चले , चले वतन के वास्ते
कर्म वीर हम बने , कर्म हो वतन के वास्ते
सर हमारा गर कटे , कटे वतन के वास्ते
लेखनी जब भी चले , चले वतन के वास्ते
ऋषियों की संतान हम , इश का वरदान है
मात्र-भू के लाल हम , भारत की पहचान है
राष्ट्र प्रहरी हम बने , उठे वतन के वास्ते
लेखनी जब भी चले चले वतन के वास्ते"
राष्ट्र प्रहरी हम बने , उठे वतन के वास्ते
लेखनी जब भी चले चले वतन के वास्ते"
चिंतन
चाचा नेहरु और गाँधी जी , मिलकर करते है संवाद
गहन विषय चिंतन करते है, मन बहुत दुखी उदास
भारत माता व्यथित कड़ी है , संगीनों का पहरा है,
चरित्र हीन हो गए है नेता, क्या ये भी दुःख थोडा है,
राम राज्य नहीं है फिर भी , राम भरोसे चलता देश,
पथ भ्रष्ट पूरे जोरो से ,जन-जन तक देते सन्देश
इस जीवन का मोल नहीं तो, जीवन से उठता विश्वास,
गहन विषय चिंतन करते है ------------------
प्रजातंत्र के मंदिर में , जब तब जूते चलते है,
देख शिवालय की मूरत भी,सो-सो आहे भारती है,
आस्थाओ पर गद्दारों ने ,जब जब गोली दागी है,
शांति का पाठ पढाया ,नपुन्सको की टोली है,
राष्ट्र-भक्तो का भारत भू पर ,पग-पग हो रहा उपहास
गहन विषय चिंतन करते है -----------------
खोते इस सम्मान को ,पुनः स्थान दिलाना है,
कसम तुम्हे है जननी माँ की,ये अंधियार मिटाना है,
गद्दारों को भारत भू से , चुन-चुन मार भगाना है ,
जहा गिरे इस माँ के आसू ,अपना खून बहाना है
माँ का मान बड़े सदा,करते रहे सद प्रयास,
गहन विषय चिंतन करते है -------------
*** इति!!
राम-सेतु
राम से बढकर नाम प्रभु का ,संत यही बतलाते है
नाम ही करता कम सभी का , जो राम नहीं कर पाते है
नाम ही करता कम सभी का , जो राम नहीं कर पाते है
राम नाम लिखने से ही, पत्थर भी तिर जाते है,
अंत समय की चली यात्रा, सब राम नाम गुण गाते है,
राम नाम की महिमा न्यारी, इसको न बदनाम करो,
जन-जन के महानायक रघुवर, झुककर तुम प्रणाम करो,
पित की आज्ञा मन राम ने, राज्य अयोध्या त्याग दिया,
वन-वन भटके मेरे राम जी, दुष्टों का संहार किया,
धर्म ध्वजा ले चले राम जी, सेतु का निर्माण किया ,
राम सेतु के नाम से तुमने, श्री राम का क्यों अपमान किया
सत्ता के मद्चूर हुए तुम , राम को क्यों झुट्लाते हो,
मोह-माया में फसकर के तुम, राम का मन घटाते हो,
दो अक्षर के नाम से देखो, जनम सफल हो जाते है,
जो ना मने मेरे राम को , दुनिया से मिट जाते है,
प्रेम से मिलकर महिमा गाओ, उसी राम के नाम की,
जय-जय राजा राम की, जय बोलो हनुमान की,
******* इति *******
माँओ से कहना लाल दो, बहनों से अपने भाई
मात्र-भूमि पर फिर दुश्मन ने आंख उठाई
इश्वर का आशीष है हम, और ऋषियों की संतान,
हमको प्राणों से भी प्यारा, अपना हिंदुस्तान
अठखेलिया सिंहो से करते, भारत की शान बड़ाई,
मात्र-भूमि पर -------------------------
मात्र-भूमि का मन बढाता, वह अमर हो जाता,
वीर शिवाजी, भगत सिंह,आजाद सा मन वो पाता
सोई ताकत जगे देश मै, हमने अलख जगाई,
मात्र-भूमि पर -------------------------
इस संसार मै हमने सदा ही, प्रेम सन्देश पहुचाया,
फूल के बदले शूल भेजते,निर्बल सा धमकाया
मात्र-भूमि पर प्राण न्योछावर, गरज उठी तरुनाई,
मात्र-भूमि पर --------------------------
देश भक्ति और देश प्रेम का, गीत हमे है गाना,
सपनो से भी सुंदर है, हमे भारत वर्ष बनाना,
जननी मांगे दूध की कीमत, बहना बांधे कलाई,
मात्र-भूमि पर ------------------------
माँओ से कहना लाल दो, बहनों से अपने भाई
मात्र-भूमि पर फिर दुश्मन ने आंख उठाई
******* इति ******
(प्राचीन नगरी सिद्धपुर सीहोर)
गौरव - गाथा
वीरो की गौरव गाथा , वीरो का बलिदान है,
सिद्धपुर की पावन माटी, शिवना तट महान है,
स्वतन्त्रा की धारा मै रुख, संगीनों का मोड़ दिया,
मुक्त किया इस भारत भू को, सिद्धपुर को मन दिया,
करो वंदना इस माटी की, जन्मे पुत्र महान है,
सिद्धपुर की पावन -----------------------
भारत माँ के पुत्रो ने, उनका जब प्रतिकार किया,
छल और बल से उन वीरो का, दुश्मन ने सहार किया,
माँ के चरणों शीश चदा कर,बड़ा दिया अभिमान है,
सिद्धपुर की पावन माटी -----------------
वीर बहादुर नाम था जिनका, उनके वीरो से थे काम.
वीरो के गौरव स्थल को, मेरा शत-शत बार प्रणाम,
सच्चे थे वे वीर सिपाही, ऋणी ये हिंदुस्तान है,
सिद्धपुर की पावन माटी-----------------
****इति****
विदाई -गीत
देते दुआ बाबुल, रोती है माई
रो-रो विदा तुझको करता है भाई,
कैसा मिलन है ये कैसी जुदाई,
रब जाने किसने ये रीत बनाई,
देते दुआ बाबुल --------------------
अखियो मै नीर और मन मै उमंग है,
ओ मेरी लाडली ये खुशियों का संग है,
पिया से मिलन और बाबुल से जुदाई,
चली अरमानो की डोली देखो शुभ घडी आई,
देते दुआ बाबुल -----------------
स्वप्न हुआ तू कभी आंगन में खेले,
नाज़ कई तेरे बाबुल ने झेले,
ये सखिया सहेली गाती है विदाई ,
कल तक जो अपनी थी हुई पराई,
देते दुआ बाबुल-----------------
चाँद तारो से मांग ये तेरी सजे,
फूल रहो मै हो तू जहा भी चले,
गम का साया ना हो ना अँधेरा रहे,
हो जहाँ की ख़ुशी तू जहाँ भी रहे,
देते दुआ बाबुल ----------------
****इति****
व्यंग
भूली बिसरी याद आती, हमको एक कहानी,
अपने बुजुर्गो के मुख से, हमने सुनी जुबानी,
कही मिली थी एक गधे को, पड़ी शेर की खाल,
ओड़ खाल को उस गधे ने, बहुत किया धमाल,
निश्चिन्त होकर खेत रोंद्ता, करता था वह मनमानी,
लेकिन ईश्वर प्रद्दत उसकी, आदत थी बड़ी पुरानी,
उदर की पीड़ा शांत होते ही, उसको थी लोट लगनी,
गधे ने खुद को शेर समझ, बहुत की मनमानी,
अपना स्वरुप बदल लिया स्वाभाव बदल ना पाया,
गधे के गधे पन ने , अपना चमत्कार दिखाया,
उसका स्वर और लोटन क्रिया, देखा कृषक शरमाया,
अपनी करनी का फल, उस गधे ने पाया,
*****इति!!
व्यंग
साहित्य की जिस विधा ने, हमको हास्य से जोड़ दिया
उसी हास्य ने हमको, भीतर-भीतर तोड़ दिया,
स्वयं गड़ते है मूरत, फिर उपहास उड़ाते है,
हास्य और व्यंग के नाम से, जाने क्या-क्या सुनते है,
अपने पुत्रो के कृत्यों से, भारत माँ शर्मसार हुई,
हास्य व्यंग की विधा भी, क्यों इतनी लाचार हुई,
त्यौहार हमारे आते है, संगीनों के पहरों मै,
भारत माँ को बांट दिया, मजहब के ठेकेदारो ने,
अपने घर मै आग लगी, अपने कर हम ताप रहे,
वफ़ा और श्रम को, अपने पैमाने नाप रहे,
एक श्वान पल कर देखो, जीवन भर साथ निभाएगा,
गधा फिर भी गधा है, जीवन भर बोझ उठाएगा,
मूक प्राणी होकर भी, ना अपने पथ विचलित हुए,
सर्व श्रेठ कृती ईश्वर की, हम प्राणी विचित्र हुए,
जिस शाख पर बेठे है, उसी शाख को काट रहे,
घायल भारत माता को, तिल-तिल कर हम बाट रहे,
ऋषियों की संतान हम, क्यों न हम वीर बने,
भारत माता की हम, सदा ही शमशीर बने,
हास्य व्यंग की सार्थकता तभी है, हम भारत माँ की पीर हरे!
इति!!
जल ही जीवन है!!
ढूँढ रहा हूँ उस बदरी को, बरसे जो इस आंगन मै,
घर का पता उसे बताना जो मिल जाये रहो मै,
ढूँढ रहा हूँ उस बदरी -----------------
(१)
मन मयूर खामोश खड़ा है, सुनी पनघट की रहे,
सूख रहा तुलसी का विरवा, उमस से निकल रही आहे,
अपनी अब तो अरज लगाये, जाके हरी के मंदिर मै,
ढूँढ रहा हूँ उस बदरी ---------------
(२)
क्यों रूठी है ये बदरी, समझ के हम न समझ पाए,
कोई जतन करे सब मिलकर, लौट के वो घर को आये,
ऐसी बरसे फिर बदरी, भर दे उमंगें जीवन मै,
ढूँढ रहा हूँ उस बदरी ---------------
(३)
पनघट पर करें चुहल गुजारियाँ, रीति न कोई गागर हो,
प्यासे कंठ रहे न कोई, हर आंगन हरियाली हो,
अपनी पलके बिछी रहें, बरखा की अगवानी मै,
ढूँढ रहा हूँ उस बदरी -------------
इति!!
अपने स्वार्थ की खातिर ये, अपनी माँ को छलते है,
माँ तेरे बच्चे तेरे तन का, खून चूस कर बड़ते है,
नहीं शर्म है, न कोई भय है, सब स्वार्थ की भेंट चड़े,
ये तो भोगे इस जीवन को, माँ कल मरती आज मरे,
अपने स्वार्थ की खातिर ये,------------
(१)
सुरा और सुन्दरी का मद है, ना तेरा कुछ ध्यान करे,
भोग विलास की खातिर, माँ की आह उपहास बने,
माँ के कुचलते अरमानो को, ये कैसा अट्टहास करे,
ये तो भोगे इस जीवन को, माँ कल मरती आज मरे,
अपने स्वार्थ की खातिर ये,------------
(२)
अपने स्वत की खातिर ये, माँ का सौदा करते है,
भारत माता के आँचल मै, सांप खून चूसकर बड़ते है,
वतन के इन गद्दारों को हम, फिर क्यों जय-जयकार करे,
ये तो भोगे इस जीवन को, माँ कल मरती आज मरे,
अपने स्वार्थ की खातिर ये,------------
(३)
इस जीवन का अर्थ नहीं जो, माँ के रज कण साथ नहीं,
सब कुछ संभव है दुनिया मै, पर माँ जैसा प्यार नहीं,
माँ के चरणों मै अपना, जीवन ये बलिदान करे,
भारत माँ अपने बच्चो पर, फिर क्यों ना अभिमान करे,
अपने स्वार्थ की खातिर ये,-----------
इति!!
जन्म भूमि का मान करो, ये जन्नत से महान हैं,
माँ के यश गीतों से ही, उसके पुत्रो का सम्मान है,
(१)
छोड़ो बाते अहंकार की, बचपन नैन बसना है,
जननी ने हमे जन्म दिया, मात्र भूमि ने अपनाया है,
भेद किया ना इसने कोई, सप पर ही उपकार है,
माँ के यश गीतों से ही------------------
(२)
घुटनों के बल चलकर जब, माँ की गोद सिमटते थे,
धरती माँ के रज-कण से , अंग-अंग लिपटते थे,
जननी माँ से हर अर्थो मै, जन्म भूमि महान है,
माँ के यश गीतों से ही-----------------
(३)
माता को माता माना ना, ना ही कभी यशगान किया,
धर्म पंथ के झगडे मै, माँ का सीना चाक किया,
चिर-निद्रा मै लीन हुए, माँ की गोद जहान है,
माँ के यश गीतों से ही-------------
इति!!
जननी जन्म-भूमि
माँ के यश गीतों से ही, उसके पुत्रो का सम्मान है,
(१)
छोड़ो बाते अहंकार की, बचपन नैन बसना है,
जननी ने हमे जन्म दिया, मात्र भूमि ने अपनाया है,
भेद किया ना इसने कोई, सप पर ही उपकार है,
माँ के यश गीतों से ही------------------
(२)
घुटनों के बल चलकर जब, माँ की गोद सिमटते थे,
धरती माँ के रज-कण से , अंग-अंग लिपटते थे,
जननी माँ से हर अर्थो मै, जन्म भूमि महान है,
माँ के यश गीतों से ही-----------------
(३)
माता को माता माना ना, ना ही कभी यशगान किया,
धर्म पंथ के झगडे मै, माँ का सीना चाक किया,
चिर-निद्रा मै लीन हुए, माँ की गोद जहान है,
माँ के यश गीतों से ही-------------
इति!!
पैसे की माया
देखो पैसे की माया, कही धूप कही है छाया
पैसे बिन दुनिया को, जीवन रास ना आया
देखो पैसे की माया-----------------
(१)
पैसे ने दुनिया को, क्या रंग है दिखलाया,
इस पैसे के आगे, कोई रिश्ता टिक ना पाया,
देखो पैसे की माया-----------------
(२)
परछाई बना ये पैसा, इसने जग को भरमाया
जीवन भर पकड़ा इसको, अंत कुछ ना हाथ आया,
देखो पैसे की माया-----------------
(३)
पैसे की तृष्णा ने, जग को अंधकार बनाया,
पैसे के लालच में, धर्म इमां बेच कर खाया,
देखो पैसे की माया------------------
(४)
पैसे ने मुरख को, जग मै ज्ञानी बनाया,
पैसे ने हीन मानव को, जग मै सम्मान दिलाया,
देखो पैसे की माया-----------------
(५)
पैसे की माया को, कोई समझ ना पाया,
जिसने इतना समझा, जीवन भर दुख है पाया,
देखो पैसे की माया------------------
**इति !!
भारत माता
छोड़ शराफत का चौला, गुंडे आतंकी बन जायेंगे ,
भारत माता की खातिर, हम सूली पर चढ़ जायेंगे,
जब तक जियेंगे इस जीवन को, माँ के गुण हम गायेंगे,
भारत माता की रहो मै, फूल बिछाते जायेंगे,
छोड़ शराफत का चौला---------------
सो गए अहसास तुम्हारे, उन्हें जगाकर जायेंगे,
भारत माता की व्यथा के, गीत सुनकर जायेंगे,
सतरंगी चुनरी माता की, निर्दोष लहू से रंगते है,
सीता माँ की बात करे क्या, श्री राम को भी ये छलते है,
छुपे हुए गद्दारों को, वतन से दूर भगायेंगे,
इनके लहू से हम अपने भाल पर तिलक लगायेंगे,
छोड़ शराफत का चौला---------------
भारत माँ के लाल करोडो, क्या इतना समझ न पाएंगे,
दुश्मन और गद्दार कभी क्या, bharat को स्वर्ग बनायेंगे,
माँ की आँखों देंकर आंसू, ये अट्टहास लगायेंगे,
भारत माँ के साथ करोडो, लाल छले फिर जायेंगे,
माँ शारदा के पुत्र सदा ही, अपना अलख जगायेंगे,
दुश्मन थर-थर कंपेंगा जब, हम सीमा मै घुस जायेंगे,
छोड़ शराफत का चौला----------------
इति!!
माँ
नस-नस मै लहू, बनके मै दौड़ जाऊंगा,
तुमको माँ भारती के गीत सुनाऊंगा,
माँ भारती है जान मेरी माँ भारती से प्यार,
माँ भारती से मेरे गीतों का श्रंगार,
माँ भारती की चरण राज माथे लगाऊंगा,
नस-नस मै लहू------
हो कर्म मेरा भारती हो धर्म भारती,
हो जन्म कभी भी मेरा हो माँ भारती
में माँ भारती का लाल चरण शीश नवाऊंगा
नस-नस मै लहू------------
आज गा रहा यहाँ कल कही और गाऊंगा
जब भी पुकारो प्रेम से मै लौट आऊंगा,
अपनी माँ के दूध का कर्ज मै चुकाऊंगा,
नस-नस मै लहू------------
**इति !!
एक संन्देशा होली का सब मिलकर गाओ रे,
रंगों का त्यौहार है होली ख़ुशी मनाओ रे,
(१)
जल बिन धरा नहीं है जीवन
हर बूंद बचाओ रे
व्यर्थ न जल को बहाने
बस तिलक लगाओ रे
रंगों का त्यौहार----------
(२)
अम्रतम जलं का मंत्र सभी
मन मई बसो रे,
अपने श्रम से शिवना सीचो,
भागीरथ बन जाओ रे
रंगों का त्यौहार--------
(३)
अपने लहू से खेली होली
भारत माँ की आन पर,
सर्वस्त्र था किया न्यौछावर
भारत माँ की शान पर,
उठो साथियों प्राणी मात्र के,
संकट हर लाओ रे
रंगों का त्यौहार----------------
****इति!!
अपने स्वारथ की खातिर ये, अपनी माँ को छलते है.
माँ तेरे बच्चे तेरे तन का, खून चूस कर बड़ते है,
नहीं शर्म है, ना कोई भय है, सब स्वारथ की भेंट चड़े.
ये तो भोगे इस जीवन को, माँ कल मरती आज मरे,
अपने स्वारथ की खातिर--------------
(१)
पद और सत्ता का मद है, ना तेरा कुछ ध्यान करे,
भोग विलास की खातिर, माँ की आहं उपहास बने,
माँ के कुचलते अरमानो को, ये कैसा अट्टहास करे,
ये तो भोगे इस जीवन को, माँ कल मरती आज मरे,
अपने स्वारथ की खातिर--------------
(२)
अपने स्वारथ की खातिर ये, माँ का सौदा करते है,
भारत माता के आँचल मई, ये खून चूसकर बड़ते है,
वतन के इन गद्दारों को हम, फिर क्यों जय-जयकार करे,
ये तो भोगे इस जीवन को, माँ कल मरती आज मरे,
अपने स्वारथ की खातिर--------------
(३)
इस जीवन का अर्थ नहीं जो, माँ के रज-कण साथ नहीं,
सब कुछ संभव है दुनिया मै, पर माँ जैसा प्यार नहीं,
माँ के चरणों मै अपना, जीवन ये बलिदान करे,
भारत माँ अपने बच्चो पर, फिर क्यों ना अभिमान करे,
अपने स्वारथ की खातिर--------------------
इति !!

















2 comments:
nice
APKI SABHI RACHNAYE SARHNIYA HE
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